बचपन........
बचपन के खेल कोई फिर से खिला दे
उम्र मेरी लेले और मुझे बच्चा बना दे।
जब कागज की कश्ती थी पानी का
किनारा था,
पानी की चाय थी झूठी-मूठी का
खाना था।
कोप भवन में जाकर अपनी बात
मनवाना था,
खेलने की मस्ती थी ये दिल भी
आवारा था ।
कहाँ आ गए इस समझदारी के
दलदल में ,
वो नादान बचपन भी कितना
प्यारा था ।
बचपन की मासूमियत न जाने कहाँ
छूट गई है ,
वक्त से पहले ही वो रूठ कर दूर
चलीगई है ।
मेरे रूठे हुए बचपन को कोई मना कर
बुला दे ,
कट्टी-चुप्पी वाले दिन काश फिर मुझे
दिला दे ।
आज का दिन मंगलमय हो
ADD 1
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3 comments:
Good writing
This is true of childhood life.
Very nice👌👌👌 😔😔😔
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